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ASI

उत्खनन् एवं अन्वेषण

उत्खनन् एवं अन्वेषण

वर्ष

स्थान

2003-04

खूंटी

2011-12

चतरा

2012-13

चतरा

2017-18

पलामू

सारिदकेल उत्खनन : वर्ष 2004 की फरवरी-मार्च महीने में रांची मंडल के तत्कालीन अधीक्षण पुरातत्वविद श्री ओमकार नाथ चौहान के निर्देशन में सारिदकेल उत्खनन किया गया था । सारिदखकेल एक ऐतिहासिक पुरास्थल है । वर्ष 2003-2004 में सुव्यस्थित तरीके से किये गये सर्वेक्षण से यहां बिखरे कई अवशेषों का पता चला था जिससे सामान्य तौर पर ऐतिहासिक पुरास्थल के बारे में और विशेष तौर पर सारिदकेल के बारे मे कई जानकारी प्राप्त हुई थी । प्राप्त संरचनात्मक अवशेषों एवं अनुभागों के अध्ययन से यहां तीन क्रमागत निर्माण चरणों एवं उनमें अंतर्निहित कई उपचरणों का पता चला था ।
उत्खनन के परिणाम स्वरुप यहां दो बार बसावट के प्रमाण मिले । यद्यपि दोनों एक ही संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते थे । सीमित क्षेत्र मे खुदाई किये जाने के कारण प्रथम काल के संरचनात्मक अवशेषों के बारे मे अधिक जानकारी नही मिल पाई तथापि निचले स्तरों से पके हुए ईटों के प्रमाण मिलने से यह स्पष्ट था कि उस समय के निर्माण में पकाई गई ईटों का प्रयोग किया जा रहा था । एक बडी संख्या मे पिट भी मिले थे जिनके अंदर चारकोल, लौहमल एवं रेत मिले थे । इन पिट्स की व्याख्या लोहे गलाने वाले भट्ठियों के रुप में की गई । द्वितीय काल में बड़े पैमाने पर भवन निर्माण के प्रमाण मिले । टीले के किनारे ओर नदी के समानांतर एक विशाल प्राचीर के भी प्रमाण मिले जिसमें 41X26X7 सेंटीमीटर माप वाले पकाये गये ईंटो का प्रयोग किया गया था । निश्चित तौर पर यह निर्माण इस स्थल के सुरक्षा के दृष्टि से किया गया होगा ।
यहां से प्राप्त ज्यादातर मृदभांड चाक पर निर्मित, भद्दी बनावट वाले, मोटे अनुभाग के तथा लाल रंग के है । लाल रंग के साथ ही धूसर, काले एवं लाल चमकीले (Red Slipped) मृदभांड भी प्राप्त हुए है । मृदभांड के प्रमुख प्रकार में घुंडीदार ढक्कन, चपटे सतह वाले कटोरे, स्प्रिंकलर तथा खरोंच कर बनाये गये अलंकरण विन्यास से कुषाण प्रभाव का पता चलता है । अन्य पुरावशेषों में लोहे से बने कई औजार एवं लौह धातु मल भी मिले । इनके अतिरिक्त तांबे के बने हुक एवं छ्ड़, मिट्टी की बनी मुहरें, तांबे के सिक्के संभवत: सांचे में ढाल कर बनाये गये थे । मिट्टी से बनाये गये मानव एवं पशु आकृतियां, चाल्सीडोनी अगेट एवं कार्नेलियन के बने मनके तथा एक दो पैर वाला सीललोढ़ा भी प्राप्त हुआ था ।
विशाल किलेबंदी से यह अनुमान होता है कि इस पुरास्थल की अपनी एक सुनिश्चित योजना थी और तदनुसार सुरक्षा के प्रर्याप्त प्रबंध किये गये थे । प्राप्त मृदभाडों और पुरावशेषों के आधार पर यह स्पष्ट: कहा जा सकता है कि यहां रहने वाले लोग लोहे का प्रयोग करते थे और लौह तकनीक से भली भांति परिचित थे । इस स्थल पर शाही निवास होने या फिर मठ का एक भाग होने को सुनिश्चित करने के लिए आगे और प्रयास की जरुरत है । यद्दपि इस उत्खनन में स्थल की तीथि निर्धारित किये जाने हेतु कोई पुरावशेष प्राप्त नही हुआ था तथापि प्राप्त प्रमाणों के आधार पर इस स्थल की तिथी प्रथम द्वितीय सदी ई. निर्धारित किया जाना ज्यादा तर्क संगत प्रतीत होता है ।

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इटखोरी का उत्खनन - झारखंड के चतरा जिले में स्थित इटखोरी का उत्खनन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के रांची मंडल द्वारा वर्ष 2011-12 एवं 2012-13 में किया गया । इटखोरी का पुरातत्वविक टिला मोहानी नदी के दाहिने तट पर स्थित है तथा इटखोरी गांव से पश्चिम में एक किलोमीटर की दूरी पर है । यह स्थल रांची से 150 किलोमीटर हजारीबाग से 55 किलोमीटर तथा जिला मुख्यालय से चतरा से 33 किलोमीटर की दूरी पर है । इस स्थल के सांस्कृतिक अनुक्रम को जानने एवं पाल काल के भौतिक संस्कृति को समझने के उद्देश्य से कुल 14 खात लगाये गये । इनमें से 2-3 खातों में नीचे के प्राकृतिक स्तर तक खुदाई की गई जिससे यह पता चला की यहां पर लगभग 1.5 मीटर मोटा सांस्कृतिक जमाव है जो 9-10 वीं शताब्दी ईसवी की एकल संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है । इस खुदाई में स्तूप के प्रमाण मिले यह स्तूप पूर्व से पश्चिम 10.90 मीटर तथा उत्तर से दक्षिण 13.90 मीटर की परिमाप का था ।
इस स्तूप की आयताकार मेधि बलुआ पाषाण खंडो के दो स्तरों से बना है जिसके उपर ईटों के तीन स्तर से निर्मित अंड है । यह महत्वपूर्ण है कि प्रयुक्त सभी बलुवा पाषाण खंडो पर सजावटी विन्यास पौराणिक नारीचरित्रों, कृतिमुख, गंधर्व- युगल आदि का अंकन है । इस मुख्य स्तूप के 1.6 मीटर दक्षिण में एक दूसरा स्तूप है जिसका क्षेत्रफल 6.40 वर्ग मीटर है । उत्खनन के दौरान बुद्ध का सिर, पुरुष परिचर एवं कई मनौती स्तूप भी प्राप्त हुये थे । इसके अतिरिक्त मिट्टी के मनके, होपस्कोच, मिट्टी के बर्तन, पशुआकृतियां, खिलौने, लोहे के बने कील, सांकल, वाणाग्र, छल्ले आदि तथा पत्थर के बने होपस्कोच, मनके, स्कीन रबर, शिवलिंग, सील-लोढे, टुटे हुये मूसल आदि भी प्राप्त हुऐ थे ।

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काबराकला उत्खनन - वर्ष 2017-18 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के रांची मंडल द्वारा पलामु जिले मे स्थित काबराकला का उत्खनन डा. हरिओम शरण के निर्देशन में किया गया इसके परिणाम स्वरुप यह ज्ञात हुआ कि इस स्थल की बसावट उत्तरी कृष्ण मार्जित मृदभांड का प्रयोग करने वाले लोगों ने किया था और तबसे लेकर उत्तर गुप्त काल तक यह स्थल लगातार आबाद रहा । वर्तमान समय में भी स्थानीय लोगों के द्वारा इस टीले पर बसावट जारी है । उत्खनन के प्रमाणों से यह अनुमानित होता है कि यह स्थल जनपद काल मे विकसित हुई तथा मौर्य काल में यह स्थल एक पूर्ण विकसीत शहरी केंद्र था जिसके संरचनाओं में पक्के ईटों का प्रयोग किया गया था और जहां वलय कूपों के प्रयोग से एक सुब्यवस्थित सफाई प्रणाली की व्यवस्था थी । स्थानीय लोगों के लगातार बसावट और कृषि कार्य आदि के कारण इस टीले का काफी नुकसान हुआ है ।
समीपवर्ती अन्य पुरास्थलों के सर्वेक्षण से यह ज्ञात होता है कि काबराकला उनमें से सबसे बडा पुरास्थल था तथा दूसरे पुरास्थलों के विपरीत इस स्थल की किले बंदी की गई थी । सुव्यवस्थित सफाई, कृषि एवं व्यापार की गतिविधि के प्रमाण तथा अन्य पुरावशेषों से इसके एक विकसित अर्थव्यवस्था वाले केंद्र होने का पता चलता है ।
पूर्ववर्ती दो कालावधियों की तुलना मे गुप्त काल के पुरावशेष कम मिलते हैं । इससे यह संकेत होता है कि इस काल तक आकर काबराकला का महत्व गौण हो रहा था । इस काल के महत्वपूर्ण पुरावशेषों में मिट्टी की चुडियां, कांच की चूडियां, मिट्टी के मनके तथा लोहे से बने औजार मिले हैं । प्राप्त मृदभांड लाल रंग के है तथा यदा- कदा उनपर अलंकरण अभिप्राय भी बनाये गये हैं ।
इसका उत्तरवर्ती चरण गुतोत्तर काल है । इस काल से ईटों की बनी महत्वपूर्ण संरचनाएं मिली हैं जिसके अवशेष काफी बड़े क्षेत्र में फैले हैं । इससे एक सुव्यवस्थित नगर योजना का पता चलता है । स्थानीय अनुश्रुतियों के अनुसार यहां काबरा नामक एक राजा हुआ करता था जिसकी लडाई रोहतास के राजा रोहित से हुई थी और इस युद्ध के परिणाम स्वरुप काबराकला का पतन हो गया ।

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बेनी सागर पुरास्थल की वैज्ञानिक सफाई - भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, रांची मंडल द्वारा वर्ष 2009-2010 तथा पुन: वर्ष 2019-2020 में बेनी सागर पुरास्थल का वैज्ञानिक रीति से मलवा हटाने का कार्य किया गया इस कार्य के दौरान कई पंचायतन मंदिरों के अवशेष अनावृत हुए । इसके साथ ही अग्नि, गणेश, महिषासुर मर्दनी, सुर्य, ब्रम्हा शिरोछेदक, भैरव, लकुलीश, यमुना, शिवलिंग, कामदृश्य को दिखाने वाले पाषाण फलक तथा मंदिर स्थापत्य के कई खंड यथा द्वार- चौखट, शाखायें एवं सिरदल आदि प्राप्त हुए ।

हाराडीह पुरास्थल की वैज्ञानिक सफाई- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, रांची मंडल द्वारा वर्ष 2014-15 में हाराडीह पुरास्थल स्थित आधुनिक मंदिर के दक्षिणी पूर्वी भाग में वैज्ञानिक रीति से सफाई का कार्य किया गया इसके परिणामस्वरुप पूर्वी भाग में शिवलिंगो का एक समूह प्रकाश में आया जबकि दक्षिणी भाग में पक्की ईटों से बनाई गई दो बड़ी संरचनायें अनावृत हुये । इन ईटों की माप 38 x22x 7.5 सेंटीमीटर पाई गई । इनमें से एक संरचना जो एक चबुतरे की तरह थी, के उपर एक शिवलिंग प्रतिष्ठापित था । इससे लगती एक दुसरी संरचना एक छोटे कमरे के समान थी । इसके अलावे यहां से बडी संख्या में मृदभांडो के टुकडे जिसमें लाल रंग मृदभांडो की प्रधानता थी तथा लोहे के बने औजार प्राप्त हुए ।

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वर्ष