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प्राचीन सरोवर एवं मंदिर समुह के ध्वंशावशेषों बेनीसागर

ASI प्राचीन सरोवर एवं मंदिर समुह के ध्वंशावशेषों बेनीसागर

प्राचीन सरोवर एवं मंदिर समुह के ध्वंशावशेषों

बेनीसागर या बेनुसागर (अंक्षास 210 59’ 02’’ उत्तर देशांतर 850 53’ 39” पूर्व ) झारखंड राज्य के पश्चिम सिहंभूम जिले के मझगांव प्रखंड में स्थित है और उडीसा राज्य के मयुरगंज जिले की सीमा पर अवस्थित है । यह पश्चिमी सिहंभूम जिले के मुख्यालय चाइबासा से 85 किलोमीटर दक्षिण में तथा मझगांव प्रखंड से 17 किलोमीटर की दूरी में स्थित है । संभवत: बेनु नाम के किसी राजा के द्वारा यहां स्थित सरोवर का निर्माण कराये जाने के कारण इस स्थल का नाम बेनीसागर पड़ा । इस सरोवर की परिमाप लगभग 300 मीटर X 340 मीटर है । सन 1840 में कर्नल टिकेल ने इस स्थल का भ्रमण किया था और पहली बार इसे प्रकाशित किया । तत्पश्चात सन 1875 में जे. डी. बेगलर ने इस स्थल का भ्रमण किया तथा कतिपय मुर्तियों एवं संरचनाओं को देख कर इस स्थल की प्राचीनता सातवीं सदी ई. के आस पास तय की । यद्यपि लोकश्रुतियों के आधार पर इस सरोवर के निर्माता राजा वेनु को माना जाता है तथापि पुरातात्विक आधार पर इस तथ्य की पुष्टि अभी तक नहीं हो पाई है ।

सरोवर के दक्षिण पूर्वी किनारों पर किये गए खुदाइयों से दो पंचायतन मंदिर के अवशेष व कुछ अन्य संरचनायें तथा कई प्रतिमायें यथा सूर्य, भैरव, लकुलीश, अग्नि, कुबेर आदि प्राप्त हुये हैं । इनके अतिरिक्त पाषाण की बनी एक मुहर प्राप्त हुई जिसपर प्रियांगु धेयम चतुविद्या (चतुर्विद्या) अंकित है जिसका मतलब है कि पियांगु नाम का एक व्यक्ति था जो चारो वेदों का ज्ञाता था । इस लेख की लिपि ब्राह्मी है तथा भाषा संस्कृत है । लेखन शैली के आधार पर इसकी तिथि पाचवीं सदी ई. निर्धारित की जा सकती है । इस प्रकार संपूर्ण पुरावशेषों एवं संरचनाओं का अवलोकन करने पर यह अनुमानित किया जा सकता है कि यह स्थल पाचवीं सदी ई. से लेकर लगभग 16-17 वी ई. तक आबाद था ।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के रांची मंडल ने कई सत्रों में हाल फिलहाल तक यहां वैज्ञानिक रीति से साफ- सफाई एवं मलबों को हटाने का कार्य किया है । इस कार्य के दौरान कई पंचायतन मंदिरों के अवशेषों के साथ साथ अग्नि, गणेश, महिषासुरमर्दिनी, सूर्य, ब्रह्मशिरोछेदक, भैरव, लकुलीश, विषय- वासनाओं को दर्शाने वाले दृष्यफलक, यमुना, शिवलिंग आदि कई प्रतिमाओं के खण्डित भाग एवं मंदिर स्थापत्य के कई खण्डित भाग तथा दरवाजों के चौखट, सिरदल, द्वार- शाखा आदि प्राप्त हुये हैं ।